
सावित्री पुत्र वीर झुग्गीवाला द्वारा रचित-
Virendra Dev Gaur Chief Editor (NWN)
भारतीय सनातन संस्कृति के आधुनिक जनक
भारत माता के चेतनाशील सपूत
हमें अपनी दूर दृष्टि से
भारतीय सभ्यता की गहरी जड़ों को दिखाने वाले
हे साधारण चाल-चोले वाले राष्ट्र-पुरुष
कैसे आ सिमटा था भारत का विराट-दर्शन
तेरी साधारण काया में
किसी को पता नहीं।
किसी को पता नहीं
ऐ राष्ट्रीय स्वयं सेवक अजर-अमर
कैसे आत्मसात कर पाया होगा तू
श्री राम और श्री कृष्ण की विराट-वेगवान चिंतन अमृत धारा को
किंतु समझ में आ रहा है तेरी प्रज्वलित अखंड चेतना की रोशनी से आलोकित
अमर अटल बिहारी वाजपेयी
श्री मोहन भागवत
और श्री नरेन्द्र मोदी का चैतन्य-चिंतन
भारत की माटी की सुगन्ध से पुष्ट-प्राणवान
कुछ-कुछ समझ आ रहा है किन्तु साफ-साफ
‘‘एकात्म-मानववाद’’ की सरिता को भारत की धरती पर
स्वर्ग से उतारने वाले तपस्वी भगीरथ
तूने ‘‘वसुधैव-कुटुम्बकम’’ के असीम महासागर की पा ली थी यकीनन थाह।
परम पूज्य अजर-अमर दीनदयाल उपाध्याय जी
आपके ‘‘एकात्म-मानववाद’’ की सदाबहार सरिता से
फूटी है यह पावन-मनभावन आयुष्मान भारत की अमृत-धारा
मिटाने को देश के गरीब और सामान्य आदमी की हीन भावना
जो ऊँच-नीच तेरा मेरा के बीमार भाव से रही है ग्रस्त
सबको पाँच लाख तक की कैशलैस राशि से
इलाज करा पाने की विश्व की सबसे बड़ी योजना है सचमुच मस्त।
इसे कहते हैं
‘‘एकात्म-मानववाद’’ जिसमें सबका साथ-सबका विकास समा जाए
मानव-मानव के बीच का भेद मिट जाए
यही है भारत का वसुधैव-कुटुम्बकम जिससे राष्ट्र का मस्तक उठ जाए
अब भारत-राष्ट्र की जड़ों को मिलेगा नैतिक बल
भारत में एकता-अखंडता की नदी बह निकेलगी कल-कल छल-छल।
-इति
The National News
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