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नगरीय संस्कृति का बिखरता तानाबाना और विज्ञान के सदुपयोग का अभाव

संपादकीय

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सावित्री पुत्र वीर झुग्गीवाला द्वारा रचित- 
Virendra Dev Gaur Chief Editor (NWN)

21वीं सदी की गूँज के बीच भारत में नगरीय सभ्यता चरमराती हुई दिखाई दे रही है। विज्ञान के सदुपयोग की इच्छाशक्ति गायब है। जिसके चलते सड़कें एक तरफ से बनती हैं तो दूसरी तरफ से उजड़ती हैं। सड़क के बनते ही उसके उजड़ने का सिलसिला शुरू हो जाता है। आज के युग में तो इस तरह की सड़कंे बनाई जा सकती हैं जोकि कुछ ही समय में बिना उजाड़े नलोें और अन्य तरह के पाईपों को बिछाने के लिए किसी स्थान से टुकड़ों में उठाई जा सकती हैं और फिर उन्हीं टुकड़ों को उनकी जगह फिट किया जा सकता है। ऐसे में सड़कोें को तोड़ना खोदना बंद हो जाएगा। आज के युग में सिंथैटिक और प्लास्टिक के क्षेत्र में क्राँति चल रही है किन्तु इस क्राँति का हम लाभ नहीं उठा पा रहे हैं। लचर और मजबूत टाईलों का इस्तेमाल कर हम सड़कों की खुदाई से बच सकते हैं। अभी वर्तमान में यह हो रहा है कि सड़क बनने के तुरन्त बाद जगह-जगह से नल डालने के लिए ताजा सड़कों को उधेड़ कर रख दिया जाता है फिर अनाप-शनाप तरीके से उल्टा-सुल्टा मैटीरियल लगाकर उसे ढक दिया जाता है किन्तु ताजी सड़क का सत्यानाश शुरू हो जाता है। इस प्रक्रिया में धन की बंदरबाँट जोरों पर चलती है और तकरीबन साल भर अधिकतर सड़के दुर्दशा का शिकार रहती हैं। ऐसे में धन के साथ-साथ दुर्घटनाओं के रूप में जन की हानि भी हो रही  है। यह सिलसिला थमने का नाम नहीं ले रहा है। उधर दूसरी ओर नदियों, नालों, खालों और रपटों के आसपास बस्तियां बसाई जा रही हैं। वर्षा के जल की निकासी के रास्ते बंद किए जा रहे हैं। बरसाती नदियों के हाथ पैर बाँध दिये गए हैं। इनके जल संग्रहण स्थल समाप्त हो गए हैं। इसी के साथ-साथ हमारे देश में अभी तक आपदा प्रबन्धन को संजीदगी से नहीं लिया जा रहा है। बाँधों का रखरखाव और प्रबन्धन ढीला है। बाधों के अतिरिक्त पानी को छोड़ने के मामले में घोर लापरवाही सामने आ रही है। राष्ट्रीय स्तर पर आपदा प्रबन्धन की कोई सुचारू व्यवस्था नहीं है। ऐसे में केन्द्र सरकार और राज्य सरकारों के बीच आपदा प्रबन्धन के लिए तालमेल की बात पर चर्चा करना सार्थक नहीं लगता। पूर्व प्रधानमंत्री अटल बिहारी वाजपेई ने नदियों के जोड़ने की दूरगामी पहल करने की मंशा जताई थी। इस मंशा को धरातल पर उतारने के लिए सकारात्मक कदम नहीं उठाए जा रहे हैं। कुल मिलाकर कुदरती विपदाओं से निपटने के लिए देश में समन्वित और कारगर नीतियों का अभाव है। इस कारण धन की बरबादी भी हो रही है और धन का एक बड़ा हिस्सा सुनियोजित भ्रष्टाचार में खप रहा है। नगरीय संस्कृति के मोर्चे पर हम विफल होते दिखाई दे रहे हैं। इस आधार पर ग्रामीण क्षेत्रों में चल रहे तमाम निर्माण कार्यों की गुणवत्ता और टिकाऊपन पर चर्चा करना भी जायज नहीं लगता।

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