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ढहते हुए नागरिक प्रशासन के संस्थान

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                                                                                                 (राकेश सिन्हा)

पिछले दिनों में घटी कुछ बातों ने तीन शीर्ष कानून पालन एवं सुरक्षा की एजेंसी बिलकुल असहाय दिखी I इंटेलिजेंस ब्यूरो (आईबी ) की ड्यूटी पर तैनात अधिकारीयों को दिल्ली पुलिस ने श्री आलोक वर्मा सीबीआई डायरेक्टर के घर के बाहर गिरफ्तार किया , सीबीआई में घमासान हुआ और उनके डायरेक्टर की दो साल वाली कार्यकाल के नियम की धज्जियाँ उडी और केंद्रीय सतर्कता आयोग (सीवीसी) के ऊपर सुप्रीम कोर्ट ने एक रिटायर्ड जज बैठा दिया I सीबीआई की निष्पक्षता और आज़ादी एक कोरे भाषणवाज़ी का विषय ही है । सभी सरकारों ने अपने समय में सीबीआई का दुरूपयोग किया है । वर्तमान में केंद्र की सरकार सभी संस्थाओं पर अपने कब्जे चाहती है तो सीबीआई कहाँ से उससे बच सकता है । सीबीआई एक विशिष्ट जांच एजेंसी की हैसियत से भारत की क़ानूनी व्यवस्था का अंग रही है । वर्तमान घटनाक्रम उसकी प्रतिष्ठा पर एक बड़ा आघात है । आज सीबीआई प्रकरण में सुप्रीम कोर्ट एक मिला जुला फैसला आया I श्री आलोक वर्मा ने अपने हटाए जाने के आदेश को चुनौती दी थी I उनका मांग थी कि सेक्शन 4-बी दिल्ली स्पेशल पुलिस इस्टैब्लिशमेंट कानून 1946 उनको दो साल का कार्यकाल देता है I इसके अलावा उनका कहना था कि सेक्शन 4- ए के अंदर एक हाई पवेर कमिटी जिसमे प्रधान मंत्री , नेता विपक्ष एवं सुप्रीम कोर्ट के मुख्य न्यायधीश सदस्य होते हैं , सिर्फ वही इस सम्बन्ध में कोई आदेश दे सकते है। 23 अक्टूबर 2018 की रात को जो तीन आदेश हुए, एक सीवीसी द्वारा और दो कार्मिक एवं प्रशिक्षण विभाग द्वारा , उनमे इस कमिटी से कोई सहमति नहीं ली गयी थी I अतः सीवीसी तथा कार्मिक एवं प्रशिक्षण विभाग द्वारा किये गए आदेशों को निरस्त किया जाय। एक छोटे से छह पृष्ठ के पेटिशन में श्री अलोक वर्मा और कुछ नहीं कह पाए I सुप्रीम कोर्ट ने अलोक वर्मा की प्रार्थना ठुकरा दी और उनको वापस अपने पद पर बहाल नहीं किया । इसका मतलब यह भी निकलता है कि सेक्शन 4-बी का कोई खास महत्व नहीं है । सरकार किसी सीबीआई डायरेक्टर को दो साल के पहले भी हटा सकती है । श्री अलोक वर्मा के लिए एकमात्र राहत यह रही की सीवीसी को अलोक वर्मा के खिलाफ जाँच अब एक रिटायर्ड सुप्रीम कोर्ट जज के निगरानी में करनी है I इसका दूसरा अर्थ यह भी निकलता है की सीवीसी भी निष्पक्ष नहीं रहा I उस पर सुप्रीम कोर्ट को विश्वास नहीं हैI अगर आई बी के अधिकारी अपने ड्यूटी पर थे तो आईबी को अपने अधिकारियों को बचाना होगा I अगर वो ऐसा नहीं करते तो आईबी की साख पर यह एक धब्बा माना जाएगा I वो क्या ड्यूटी कर रहे थे I इस पर बहस नहीं है I बात इसकी है कि दिल्ली पुलिस और आईबी दोनों नागरिक सुरक्षा में लगी है I उनमे सूचनाओं का आदान प्रदान होता है तो फिर इतनी गलतफहमी क्यों ? मैंने 22 साल केंद्रीय पुलिस बल का अधिकारी होने के नाते इन तीनो विभागों का प्रभाव देखा है I आज इन पर से आम नागरिकों का विश्वास उठ सा गया है I दुर्भाग्य से पुलिस अधिकारियों का राजनीतिक होना इन संस्थाओं के पतन का कारण है I यह लड़ाई नियमों की नहीं है I यह लड़ाई पुलिस अधिकारिओं के परस्पर राजनीतिक प्रभाव का महादंगल है I लेखक पूर्व डीआईजी और दिल्ली सरकार में मुख्यमंत्री के विशेष सलाहकार है तथा आम आदमी पार्टी, उत्तराखंड के प्रभारी है I

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