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doon hospital dehradun

क्या वाक्या स्वास्थ्य महकमा जिम्मेदार था?

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अर्जुन सिंह भण्डारी
देहरादून:-बीती गुरुवार को एकाएक सत्ता के गलियारों में प्रदेश के प्रतिष्ठित सरकारी दून मेडिकल कॉलेज में हुई घटना ने स्वास्थ्य विभाग के हालातों पर कई सवाल खड़े किये जिसके चलते राज्य का आम जन भी भविष्य में स्वास्थ्य संबंधी घटना होने पर अस्पताल के नाम पर सोचने पर मजबूर हुआ है। राजधानी के सबसे बड़े सरकारी अस्पताल के इस मामले की चिंगारी मुख्यमंत्री त्रिवेन्द्र रावत के कार्यालय पहुंची तो उन्होंने तत्काल इस मामले की उचित जाँच कर रिपोर्ट जल्द से जल्द देने के लिए डीजी को आदेश जरी किये है। आपको बताते चले कि गुरुवार को धामपुर निवासी पंकज अपने भाई सोनू को बीमारी के हालत में दून मेडिकल कॉलेज लाया था जहाँ कुछ देर बाद ही सोनू की मृत्यु हो गयी थी और पैसे न होने के चलते व अस्पताल द्वारा कोई एम्बुलेंस मुहैया न कराने के चलते पंकज ने अपने भाई की शव को अपनी पीठ पर उठाया जिसकी तस्वीरें अगले दिन सभी अखबारों में छपी व राज्य के सबसे बड़े सरकारी अस्पताल दून मेडिकल कॉलेज पर सवाल खड़े हुए। इसी सूरत-ए-हाल पर जाँच के आधार पर कुछ तथ्य सामने आये जिसमे घटनाक्रम के कुछ अन्य पहलु सामने आये है। दून मेडिकल कॉलेज के प्रिंसिपल डॉ. गुप्ता के अनुसार पंकज द्वारा अपने भाई को अस्पताल लाने पर डॉ. पाण्डेय ने सोनू की हालात नाजुक बताते हुए उसे तत्काल इमरजेंसी में भर्ती होने को कहा था जिसके लिए उन्हें निर्धारित तय शुल्क 1700 रूपए जमा करवाने थे पर उससे पहले ही उसके भाई की मृत्यु हो गयी जिसके बाद वह अपने भाई के शव को अपने कंधे पर उठाकर खुद ही बाहर ले जाने लगा।  जाँच की रिपोर्ट के मुताबिक पीड़ित पंकज द्वारा अस्पताल से कोई एम्बुलेंस की मांग नहीं की गयी थी पर अस्पताल कर्मियों ने उसके द्वारा अपने भाई को ले जाने में असमर्थता दिखाने पर अस्पताल प्रशासन ने उन्हें उसके भाई की लाश को पैसे न होने तक शवग्रह में रखने का व बाद में आकर ले जाने का सुझाव भी दिया था पर पंकज द्वारा उस सम्बन्ध में कोई जवाब नहीं आया और वह अपने भाई के शव को कंधे पर लेकर अस्पताल से बहार चला गया। मेडिकल सुप्रीटेंडेंट के अनुसार मौजूदा समय में दून अस्पताल में लगी 108 की एम्बुलेंस सेवाएं मात्र तो यह राज्य में मात्र मरीजों को अस्पताल तक पहुँचाने के लिए मुहैया करायी गयी है न की किसी के शव को घर तक सुपुर्द करने के लिए। मौजूदा एम्बुलेंस शव को ले जाने के मुहैया न कराये जाने के विषय में उन्होंने कहा कि इन्फेक्शन फैलने के खतरे के चलते मृत्यु होने पर शव के लिए अस्पताल द्वारा एम्बुलेंस नही दी गयी है। किसी की मृत्यु होने पर उसको अस्पताल द्वारा एम्बुलेंस सुविधाएं देने के सम्बन्ध में मेडिकल सुप्रीटेंडेंट का कहना है की इस मामले को संज्ञान में लेते हुए जल्द ही शव को घर छोडने की व्यवस्था के तहत गाड़ियों के लिए टेंडर निकले जायेंगे और जल्द ही इस सुविधा को शुरू किया जायेगा। अस्पताल द्वारा अस्पताल प्रशासन के तहत मदद न दिए जाने के बाद भी एक रिपोर्ट के अनुसार अस्पताल में मौजूद एक नर्स ने परिसर में ही मौजूद *समाज सेवी विजय* , जो की लावारिस शव का क्रियाक्रम से लेकर कई जरूरतमंदों की मदद करते है, से उसकी मदद की अपील की जिसके फलस्वरूप विजय ने वही निजी एम्बुलेंस चलने वाले अमित थापा नमक व्यक्ति से बात की तो वह 3000 रूपए में पंकज को धामपुर ले जाने को तैयार हो गया जो की गाड़ी में डलने वाले डीजल की कीमत थी।जबकि वह आमतौर पर 4000 से 5000 चार्ज करते थे। पर पंकज के पास मात्र 1000 रूपए होने की सूरत में विजय ने वहां इलाज के लिए आये किन्नरों से मदद मांगी तो उन्होंने 2000 रूपए विजय को दिए। जिसके बाद विजय ने पुलिस चौकी में मौजूद कांस्टेबल सतीश मिश्रा से इस बाबत मदद मांगी तो उन्होंने सभी से पैसे इकठ्ठा करने में सहायता की वह जमा धनराशि विजय को दी। इसके अलावा उन्होंने आसपास के लोगों से पैसे जमा किये और किसी तरह 4000 रूपए का इंतज़ाम किया जिसमे से 1000 रूपए पंकज को दिए गए। यह खाली अकेला ही मामला नहीं होगा अगर गौर किया जाये तो। यह शहर के गलियारों में घटित हुआ इसलिए सबके सामने आये। पहाड़ों के सूरत-ए-हाल पर नज़र दौड़ाए तो आज भी वहाँ की चरमराई स्वास्थ्य सेवाएं उत्तराखंड के बीते 17 साल की आज़ादी को मात्र छलावा दिखाते हुए प्रतीत होते है। आज भी कई महिलाएं बच्चे को जन्म देने के दौरान अपनी जान गांव देती है क्योंकि उनको सही समय पर स्वस्थ्य सेवाएं नहीं मिलती। इन सबका जिम्मेदार कौन अकेली राज्य की स्वास्थ्य सेवाएं या राज्य सर्कार जो राज्य में हर क्षेत्र में स्वस्थ्य सेवाएं देने क लिए कर्त्तव्यबद्ध है और अभी तक पहाड़ के हालात सुधरने में नाकाम ही साबित रही है! अगर इस पुरे घटनाक्रम पर नज़र दौड़ाई जाये तो इसमें एक पहलू सामने आये है पर उसके बाद के घटनक्रम के मुताबिक पीड़ित व्यक्ति को अस्पताल में मौजूद कर्मचारियों को अस्पताल से इतर सुविधा देने की कोशिश की गयी। पर असल सूरत में बात गौर करने की है की अस्पताल प्रशासन को या राज्य सरकार को इन मुद्दे को ज़ेहन में रखते हुए भविष्य में ऐसी स्थिति उत्पन्न न हो उस सम्बन्ध में जल्द कदम उठाने चाहिए।

इंसानियत का जीता जागता उदाहरण विजय
आज जहाँ समाज में अपने अपनों के काम नहीं आते और आम व्यक्ति दूसरों के लिए वेदनाएं खो चुका है, वही समाज के कुछ शख्स आज भी ज़िंदा है जिन्होंने इंसानियत के फ़र्ज़ को निभाकर मानवता की बड़ी मिशाल पेश की है। देहरादून निवासी *विजय एक ऐसी ही सख्सियत। इन्होंने बीते गुरुवार को अपने स्टार पर आगे बढ़कर उन पीड़ित पंकज की मदद करते हुए खुद लोगों से पैसे इकठ्ठा कर सोनू के शव को धामपुर पहुचने में मदद की।* 
समाज सेवी विजय के साथ मिलकर सोनू के शव को उसके घर पहुँचाने के कार्य में आगे आये अमित थापा सहित मित्र पुलिस कहे जाने वाली उत्तराखंड पुलिस के एक कर्मी व किन्नर समाज के द्वारा एम्बुलेंस के खर्चे के लिए दिए जाने वाले पैसों ने आज के समाज में इंसानियत ज़िंदा है का सबूत पेश किया है।

 

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