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जीवन का वास्तविक आनन्द लेने के लिये टाइम मैनेजमेंट, थाॅट् मैनेजमेंट और टंग मैनेजमेंट नितांत आवश्यक-पूज्य स्वामी चिदानन्द सरस्वती जी महाराज

जीवन का जश्न
आहार संकल्प सप्ताह

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ऋषिकेश । जनवरी का पहला सप्ताह (1 से 7 जनवरी) को ’जीवन के जश्न‘ और ‘आहार संकल्प सप्ताह’ के रूप में मनाया जाता है। वास्तव में नये वर्ष की शुरूआत आनन्द, उत्साह और अनेक नये संकल्पों के रूप में होती है। नये वर्ष की शुरूआत में अगर जीवन में श्रेष्ठ संकल्पों को जोड़ा जाये तो जीवन वास्तव में जश्न बन जाता है।
इस सप्ताह आप अपनी शिक्षा को आगे बढ़ाने, स्वस्थ रहने, योग और ध्यान करने, आध्यात्मिक जीवन शैली अपनाने, अपनी दिनचर्या को सुव्यवस्थित करने, अच्छी पुस्तकें पढ़ने और शाकाहारी जीवन शैली अपनाने जैसे अनेक छोटे-छोटे संकल्पों के साथ अपने जीवन का जश्न मनाने की तैयारी कर सकते हैं। यह सप्ताह हमें याद दिलाता है कि जीवन अनमोल है, इसलिये इसकी उपेक्षा नहीं करना चाहियें।
परमार्थ निकेतन के अध्यक्ष पूज्य स्वामी चिदानन्द सरस्वती जी महाराज ने कहा कि जीवन का जश्न मनाने के लिये स्वस्थ रहना नितांत आवश्यक है और स्वस्थ रहने के लिये सात्विक व शुद्ध आहार का महत्वपूर्ण योगदान होता है। हमें स्वस्थ जीवन शैली की राह पर आगे बढ़ना है तो अपने आहार और विहार को संतुलित करना होगा तथा अपनी जीवन शैली में सकारात्मक बदलाव करने होंगे। स्वस्थ शरीर के लिये शाकाहार के साथ अपने भोजन की आदतों को भी बदलना होगा। ’नये साल का गोल – नहीं रहेगे गोलमटोल’ और इसके लिये समय से सोना, प्रातःकाल जल्दी उठना, लो-कार्ब वाला आहार और योग नितांत आवश्यक है।
पूज्य स्वामी जी ने कहा कि जीवन का वास्तविक आनन्द लेने के लिये तीन चीजों पर ध्यान देना अत्यंत आवश्यक है, टाइम मैनेजमेंट, थाॅट् मैनेजमेंट और टंग मैनेजमेंट (समय प्रबंधन, विचार प्रबंधन और भाषा प्रबंधन) यह सोचने का समय है कि हम अपने जीवन के अनमोल समय को सोशल मीडिया, सर्च इंजन और गाॅसिप में कितना व्यर्थ गवां देते हैं? दूसरा विचार; हमारी सोच कैसी है? हजारों विचार हमारे दिमाग में एक साथ चलते रहते हैं और इससे हर समय हमारे दिमाग का ट्रैफ़िक जाम रहता है। कभी शांत बैठकर सोचें कि जितने विचार मेरे दिमाग में हर समय चल रहे हैं उनमें से कितने सकारात्मक हैं और कितने नकारात्मक है; क्या मेरे विचार मुझे शान्ति प्रदान कर रहे हैं अगर नहीं तो दूर रहना होगा ऐसी सोच से और इसके लिये ध्यान का सहारा लें तथा अपने विचारों का सही प्रबंधन करें। सबसे महत्वपूर्ण है जीभ, यह अति आवश्यक है कि क्या बोलें, कब बोलें और कैसा बोलें। संत कबीर दास जी कहते हैं कि ’शब्द सम्हारे बोलिए, शब्द के हाथ न पाँव, एक शब्द औषधि करे, एक करे घाव।’ जो बोले वह बहुत सोच-समझकर बोलें क्योंकि वाणी औषधि का काम करती है और घाव भी दे सकती है। आईये जीवन के इन अनमोल सूत्रों को याद रखें और प्रभु का धन्यवाद देते हुये हर पल जीवन को उत्सव बनायें।

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